Tuesday, July 21, 2009

सदियों के सब गीत


मेरे रीते अधरों पर फिर ,
क्यों लिख दी तरुणाई ?
हवा देह बन गई
जो मुझतक तुमको छूकर आई .


पहली बार दिखे हैं फिर भी, देखे से लगते हैं.
सपने ये अपनेपन के ये तुम्हें देख जगते हैं.
हर सपने पर धूल जमी थी ,
मैं धंुधला धुंधला था,
उतनी बार निखारा ,
जितनी बार पलक झपकाई .


बाहर से मन कब दिखता है,अंदर आकर देखो.
तुम कितने मनभावन हो ये ,मुझको भाकर देखो.
सदियों के सब गीत ,
तुम्हारे हो जाएंगे पल में ,
पल भर में तुम नाप सकोगे
युग युग की गहराई .


कब चाहा था कुछ भी पाना ,चाहा सब कुछ खोना.
तुमसे मिल जो घिटा मित्र! कुछ अनजाना ,अनहोना.
बंजर के पत्थर में भी जो ,
नवजीवन भर देता ,
वह उच्छंªखल प्रेम,
जिसे हम कहते,रामदुहाई !

2 comments:

  1. अच्छा मासूम गीत...
    रामदुहाई

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